खेल के लिए बेच दिए ट्रैक्टर और गाड़ी, मेहनत कर फिर बेटी बनीं विश्व चैंपियन
हिसार : माता-पिता अब अपने बेटियों पर इतना विश्वास करने लगे हैं कि उन्होंने अपने जीवन .की पूंजी भी उनकी सफलता के लिए दांव पर लगाने से नहीं झिझक रहे हैं। बेटी पर विश्वास की यह कहानी है हिसार जिले की।
गांव भगाना के रामनिवास ने अपनी बेटी की कड़ी मेहनत देखकर अपना ट्रैक्टर व गाड़ी तक बेच दी।
बेटी अंतिम को बेहतर डाइट मिले इसके लिए किसान रामनिवास ने खेत बेचने तक की तैयारी कर ली थी। पिता के संघर्ष को देखते हुए अंतिम ने मेहनत की।
प्रतिदिन सुबह 5 बजे से 10 बजे बन गई जिसने अंडर तक और शाम 6 बजे से नौ बजे तक नियमित अखाड़े में पसीना बहाना और उसका नतीजा यह निकला की उसकी कड़ी मेहनत रंग लाई और बुल्गारिया में आयोजित अंडर-20 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में अंतिम ने स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। परिवार की आशा पर खरा उतरी
देश की पहली भारतीय पहलवान बन गई जिसने अंडर-20 में विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीता।
बेटी के लिए गांव छोड़कर शहर में रहने लगे: अंतिम के माता-पिता ने बेटी की मेहनत व जज्बे को देखते हुए गांव छोड़कर उसके लिए शहर में आकर रहने लगे।
हिसार के आजाद नगर के पास भावना कालोनी में वे रहते हुए बेटी के लिए एक भैंस व गांय भी पाली, ताकि बेटी को दूध मिलता रहे।
प्रतिदिन दूध, दही, दलिया सहित अन्य ताकत की खाद्य सामग्री का बेटी के लिए प्रबंध किया ताकि वह शारीरिक रूप से मजबूत हो। मां का संघर्ष भी बेटी की सफलता के पीछे कम नहीं है।
अंतिम ने कहा कि मुझे पोष्टिक भोजन मिल सके इसके लिए मेरी मां उसका प्रबंध करती थी। पूरे परिवार के मेरे प्रति संपर्ण ने मेरी जीत में अहम रोल अदा किया।
नाम की कहानी: अंतिम पांच बहन भाई हैं। अंतिम से बड़ी तीन बहनें हैं। जब अंतिम का जन्म हुआ तो उसके पिता ने उनका नाम अंतिम रखा। क्योंकि वह चाहते थे और बेटियां न हों। इसके बाद उनका एक भाई हुआ।
हरियाणा में बेटियां पैदा होने पर अंतिम, भतेरी, भरपाई, धापां जैसे नाम रखने की परंपरा बहुत पुरानी है। मान्यता है कि इस तरह का नाम रखने पर अगली संतान बेटा पैदा हो जाता है। मगर यह तर्कसंगत नहीं है।

Sabhi asa he hona chaya
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